अखिलेश यादव: सियासी शतरंज का नया 'ग्रैंड मास्टर', जिसने प्यादों से दी वज़ीर को मात
Akhilesh Yadav: इस लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव ने अपने सियासी शतरंज से न सिर्फ उत्तर प्रदेश में सपा के प्रदर्शन को सुधारा बल्कि अबतक का सबसे बेहतरीन प्रदर्शन भी करके दिखाया। यही नहीं, 33.59 वोट प्रतिशत के साथ 37 सीटें हासिल करके लोकसभा में तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर 'पोडियम फिनिश' भी किया।
Akhilesh Yadav: शतरंज के खेल में उम्र और तजुर्बा मायने नहीं रखता। यह खेल सही समय पर सही चाल का है, और अगर आपके 'प्यादों' की सेटिंग सटीक है तो विपक्ष का किला कितना भी मजबूत क्यों न हो, उसे ढहने में समय नहीं लगता। अभी कुछ समय पहले 18 साल के प्रज्ञानंद ने जब शतरंज के दिग्गज और नंबर वन खिलाड़ी कार्लसन को क्लासिकल फॉर्मेट में हराया तो इस बात के मायने समझ में आए। लेकिन जिस राजनीति को शतरंज का खेल कहा जाता है, उसके धुरंधर इस बात समझ न सके और जब लोकसभा चुनाव के रिजल्ट घोषित हुए तो समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव सियासी शतरंज के नए ग्रैंड मास्टर बनकर उभरे।
यूपी की राजनीति में जिस अखिलेश यादव को 'चुका हुआ' कहा जा रहा था और उनके P.D.A फार्मूले की उपेक्षा की गई, उसी के सहारे सपा प्रमुख ने सियासी शतरंज की गोटियां ऐसी सेट कीं और भाजपा के 'वजीर' को शह और मात देने में समय नहीं लगा। इस लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव ने अपने सियासी शतरंज से न सिर्फ उत्तर प्रदेश में सपा के प्रदर्शन को सुधारा बल्कि अब तक का सबसे बेहतरीन प्रदर्शन भी करके दिखाया। यही नहीं, 37 सीटें हासिल करके लोकसभा में तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर 'पोडियम फिनिश' भी किया।
ऐसे बिछाई बिसात
कहते हैं कोई भी व्यक्ति अपने अनुभवों से ही सीखता है। बाजीगर उसे ही कहते हैं जो अपनी हार से सबक ले और जीत की जमीन तैयार करे। सपा के लगातार गिरते ग्राफ और लोकसभा व विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद अखिलेश यादव यह तो भांप चुके थे कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातीय समीकरणों को साधना कितना जरूरी है। उन्होंने चुनाव से पहले ही P.D.A.(पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) फार्मूला इजाद किया। पीडीए को मजबूत करने के लिए सबसे पहले उन्होंने पार्टी और संगठन को इसी फार्मूले के आधार पर तैयार किया।
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घोड़े वाली ढ़ाई घर की चाल
शतरंज में घोड़ा ढ़ाई घर की चाल चलता है। यही कारण है कि कई बार घोड़े की चाल सामने वाले को समझ में नहीं आती है और वह विपक्ष का बड़ा नुकसान कर देता है। शतरंज के इस मुख्य खिलाड़ी की तरह अखिलेश यादव ने टिकट बंटवारे में पीडीए के सूत्र का खास ध्यान रखा। बसपा के दलित वोट बैंक को साधने के लिए उन्होंने सामान्य सीटों पर भी दलित उम्मीदवारों को उतारा, जिसमें अयोध्या और मेरठ जैसी सीटें प्रमुख रहीं। इस फार्मूले पर उन्होंने अयोध्या में बीजेपी की राजनीति को शिकस्त दी और अपने कैंडिडेट को जीत हासिल करवाई। वहीं, मेरठ के चुनाव में भी सपा प्रत्याशी ने अरुण गोविल जैसे कैंडिडेट को नांको चने चबवा दिए।
ऊंट वाली तिरछी चाल
शतरंज में ऊंट एक ऐसा खिलाड़ी है, जो देखता तो सीधे है लेकिन मारता तिरछा और बहुत दूर तक है। इसी आधार पर लोकसभा चुनाव में वोटों का बंटवारा रोकने के लिए अखिलेश यादव ने मुस्लिम बहुल्य सीटों पर भी हिंदू उम्मीदवार को आगे कर दिया और बीजेपी की रणनीति को पूरी तरह फेल कर दिया। मुरादाबाद सीट इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, इस मुस्लिम बहुल्य सीट पर उन्होंने रुचिवीरा जैसा हिंदू् प्रत्याशी उतारा और जीत हासिल की।
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हाथी वाली सीधी चाल
हाथी सीधी और ताकतवार चाल चलता है। इस आधार पर अखिलेश यादव ने अपने परिवार की पारंपरिक सीटों पर भी सीधा चुनाव लड़ा और बीजेपी को सीधी टक्कर देखते हुए अपना दम दिखाया। उन्होंने कन्नौज, मैनपुरी, बदायूं, आजमगढ़ और फिरोजाबाद में जातीय समीकरणों को साधने के बजाए पार्टी के पारंपरिक वोटरों पर भरोसा जताया और यादव उम्मीदवारों को ही टिकट दिया। ये पांच यादव उम्मीदवार उनके अपने ही परिवार के थे। जबकि, 2014 में पार्टी ने 12 और 2019 में 10 यादव उम्मीदवार उतारे थे।
शह और मात
अखिलेश यादव इस लोकसभा चुनाव में विपक्ष को शह और मात देने के लिए पूरी सेटिंग शतरंज की बिसात की तरह की और उसी तरह गोटियां सेट कीं। जब चुनाव के परिणाम सामने आए तो उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक हाशिए पर पहुंच चुकी पार्टी ने 37 सीटों पर जीत तो हासिल की ही बल्कि अपना वोट बैंक बढ़ाने में भी कामयाब रही। इस चुनाव में सपा को 33.59 फीसदी वोट मिले, जो सपा का अबतक का सबसे बेहतरीन प्रदर्शन है। जबकि, 2019 के चुनाव में सपा को 18.18 फीसदी ही वोट मिले थे। वहीं, 2019 में 62 सीटें जीतने वाली बीजेपी को उन्होंने 33 सीटों पर समेट दिया।
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