Obaidullah Aleem Shayari: रौशनी आधी इधर आधी उधर, इक दिया रक्खा है दीवारों के बीच.., दिल जीत लेंगे उबैदुल्लाह अलीम के ये चुनिंदा शेर
Obaidullah Aleem Shayari: उबैदुल्लाह अलीम ने जीवन के हर रंग को अल्फाज दिये और अपने शायरी में उतारा। उनकी शायरी में ऐसा जादू था कि सुनने या पढ़ने वाले बस उसी में डूब कर रह जाते। यहां पढ़ें उबैदुल्लाह अलीम के कुछ मशहूर शेर:



Obaidullah Aleem Shayari
Obaidullah Aleem Shayari in Hindi: जब भी उर्दू के बेहतरीन शायरों की बात होगी तो बिना उबैदुल्लाह अलीम के जिक्र के खत्म नहीं हो सकती। भोपाल में जन्मे उबैदुल्लाह अलीम बंटवारे के बाद पाकिस्तान चले गए। लेकिन पाकिस्तान में उन्हें कम परेशानियां नहीं झेलनी पड़ीं। दरअसल उबैदुल्लाह ने अपने करियर की शुरुआत रेडियो से की और बाद में वह एक निर्माता के रूप में टेलीविजन से जुड़ गए। साल 1978 में वह अहमदिया मुस्लिम समुदाय का सदस्य हो गए। अहमदी होने के कारण उनसे इस्तीफा ले लिया गया। अपने जीवन के मसलों और दर्द को उबैदुल्लाह अलीम ने कागज पर बखूबी उतारा। उनकी शायरी में एक ऐसा अल्हड़पन और नयापन है जो लोगों को खूब रास आया। यहां देखें उबैदुल्लाह अलीम के चुनिंदा शेर।
1. अज़ीज़ इतना ही रक्खो कि जी सँभल जाए
अब इस क़दर भी न चाहो कि दम निकल जाए
2. हवा के दोश पे रक्खे हुए चराग़ हैं हम
जो बुझ गए तो हवा से शिकायतें कैसी
3. अब तो मिल जाओ हमें तुम कि तुम्हारी ख़ातिर
इतनी दूर आ गए दुनिया से किनारा करते
4. काश देखो कभी टूटे हुए आईनों को
दिल शिकस्ता हो तो फिर अपना पराया क्या है
5. एक चेहरे में तो मुमकिन नहीं इतने चेहरे
किस से करते जो कोई इश्क़ दोबारा करते
6. जवानी क्या हुई इक रात की कहानी हुई
बदन पुराना हुआ रूह भी पुरानी हुई
7. हज़ार तरह के सदमे उठाने वाले लोग
न जाने क्या हुआ इक आन में बिखर से गए
8. हाए वो लोग गए चाँद से मिलने और फिर
अपने ही टूटे हुए ख़्वाब उठा कर ले आए
9. ज़मीं के लोग तो क्या दो दिलों की चाहत में
ख़ुदा भी हो तो उसे दरमियान लाओ मत
10. रौशनी आधी इधर आधी उधर
इक दिया रक्खा है दीवारों के बीच
11. ये कैसी बिछड़ने की सज़ा है
आईने में चेहरा रख गया है
12. मैं उस को भूल गया हूँ वो मुझ को भूल गया
तो फिर ये दिल पे क्यूँ दस्तक सी ना-गहानी हुई
13. मैं एक से किसी मौसम में रह नहीं सकता
कभी विसाल कभी हिज्र से रिहाई दे
14. अगर हों कच्चे घरोंदों में आदमी आबाद
तो एक अब्र भी सैलाब के बराबर है
15. तुम अपने रंग नहाओ मैं अपनी मौज उड़ूँ
वो बात भूल भी जाओ जो आनी-जानी हुई
16. शिकस्ता-हाल सा बे-आसरा सा लगता है
ये शहर दिल से ज़ियादा दुखा सा लगता है
17. जो आ रही है सदा ग़ौर से सुनो उस को
कि इस सदा में ख़ुदा बोलता सा लगता है
18. मुझ से मिरा कोई मिलने वाला
बिछड़ा तो नहीं मगर मिला दे
19. खा गया इंसाँ को आशोब-ए-मआश
आ गए हैं शहर बाज़ारों के बीच
20. दोस्तो जश्न मनाओ कि बहार आई है
फूल गिरते हैं हर इक शाख़ से आँसू की तरह
उम्मीद करते हैं कि उबैदुल्लाह अलीम के ये चुनिंदा शेर आपको जरूर पसंद आए होंगे। इन शायरियों में कोई ना कोई शेर ऐसा जरूर होगा जिससे आप अपने आप को जोड़ पाए होंगे। यही जादू है उबैदुल्लाह अलीम की शायरी में।
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मैं टाइम्स नाऊ नवभारत के साथ बतौर डिप्टी न्यूज़ एडिटर जुड़ा हूं। मूल रूप से उत्तर प्रदेश में बलिया क...और देखें
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